॥ श्रीहरिः ॥
परीक्षिदुवाच
आज्ञाप्योऽहं यथा कार्यः सहायोऽत्र मया तथा।
सूत उवाच
श्रुत्वैतदुद्धवो वाक्यमुवाच प्रीतमानसः॥ ५३
śrutvaitaduddhavo vākyamuvāca prītamānasaḥ|| 53
अर्थ
सूतजी कहते हैं—परीक्षित्का यह वचन सुनकर उद्धवजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और बोले॥ ५३॥
श्रुत्वैतदुद्धवो वाक्यमुवाच प्रीतमानसः॥ ५३
सूतजी कहते हैं—परीक्षित्का यह वचन सुनकर उद्धवजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और बोले॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 999) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/3/53/