श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.3.70

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स्वात्मानं कृष्णवैधुर्यान्मुक्तस्तद्भुव्यशोभत।

ताश्‍च तन्मातरः कृष्णे रासरात्रिप्रकाशिनि॥ ७०

svātmānaṃ kṛṣṇavaidhuryānmuktastadbhuvyaśobhata|

tāśca tanmātaraḥ kṛṣṇe rāsarātriprakāśini|| 70

अर्थ

उस समय सभी श्रोताओंने अपनेको भगवान्‌के स्वरूपमें स्थित देखा। वज्रनाभने श्रीकृष्णके दाहिने चरणकमलमें अपनेको स्थित देखा और श्रीकृष्णके विरहशोकसे मुक्त होकर उस स्थानपर अत्यन्त सुशोभित होने लगे। वज्रनाभकी वे रोहिणी आदि माताएँ भी रासकी रजनीमें प्रकाशित होनेवाले श्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाके विग्रहमें अपनेको कला और प्रभाके रूपमें स्थित देख बहुत ही विस्मित हुईं तथा अपने प्राणप्यारेकी विरह-वेदनासे छुटकारा पाकर उनके परमधाममें प्रविष्ट हो गयीं॥ ६९-७१॥

यह अर्थ श्लोक 69–71 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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