॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.17
भूरुण्डः शिक्षयेदन्याञ्छ्रुत्वा न स्वयमाचरेत्।
यथा हिमवतः शृंगे भूरुण्डाख्यो विहंगमः॥ १७
bhūruṇḍaḥ śikṣayedanyāñchrutvā na svayamācaret|
yathā himavataḥ śṛṃge bhūruṇḍākhyo vihaṃgamaḥ|| 17
अर्थ
हिमालयके शिखरपर एक भूरुण्ड जातिका पक्षी होता है। वह किसीके शिक्षाप्रद वाक्य सुनकर वैसा ही बोला करता है, किन्तु स्वयं उससे लाभ नहीं उठाता। इसी प्रकार जो उपदेशकी बात सुनकर उसे दूसरोंको तो सिखाये पर स्वयं आचरणमें न लाये, ऐसे श्रोताको ‘भूरुण्ड’ कहते हैं॥ १७॥