श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.32

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

येऽपि संसारसन्तापनिर्विण्णा मोक्षकांक्षिणः।

तेषां भवौषधं चैतत् कलौ सेव्यं प्रयत्‍नतः॥ ३२

ye'pi saṃsārasantāpanirviṇṇā mokṣakāṃkṣiṇaḥ|

teṣāṃ bhavauṣadhaṃ caitat kalau sevyaṃ prayatnataḥ|| 32

अर्थ

तथा जो संसारके दुःखोंसे घबराकर अपनी मुक्ति चाहते हैं, उनके लिये भी यही इस भवरोगकी ओषधि है। अतः इस कलिकालमें इसका प्रयत्‍नपूर्वक सेवन करना चाहिये॥ ३२॥

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