तथा जो संसारके दुःखोंसे घबराकर अपनी मुक्ति चाहते हैं, उनके लिये भी यही इस भवरोगकी ओषधि है। अतः इस कलिकालमें इसका प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये॥ ३२॥
येऽपि संसारसन्तापनिर्विण्णा मोक्षकांक्षिणः।
तेषां भवौषधं चैतत् कलौ सेव्यं प्रयत्नतः॥ ३२
तथा जो संसारके दुःखोंसे घबराकर अपनी मुक्ति चाहते हैं, उनके लिये भी यही इस भवरोगकी ओषधि है। अतः इस कलिकालमें इसका प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.4.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1006) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/4/32/