सकाम भावसे भागवतका सहारा लेनेवाले मनुष्य इस संसारमें मनोवांछित उत्तम भोगोंको भोगकर अन्तमें श्रीमद्भागवतके ही संगसे श्रीहरिके परमधामको प्राप्त हो जाते हैं॥ ३६॥
इह लोके वरान् भुक्त्वा भोगान् वै मनसेप्सितान्।
श्रीभागवतसंगेन यात्यन्ते श्रीहरेः पदम्॥ ३६
सकाम भावसे भागवतका सहारा लेनेवाले मनुष्य इस संसारमें मनोवांछित उत्तम भोगोंको भोगकर अन्तमें श्रीमद्भागवतके ही संगसे श्रीहरिके परमधामको प्राप्त हो जाते हैं॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.4.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1006) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/4/36/