॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.47
दारागारसुतान् राज्यं धनादि च यदीप्सितम्।
परं तु शोभते नात्र सकामत्वं विडम्बनम्॥ ४७
dārāgārasutān rājyaṃ dhanādi ca yadīpsitam|
paraṃ tu śobhate nātra sakāmatvaṃ viḍambanam|| 47
अर्थ
कथावाचक गुरुको वस्त्र, आभूषण आदि देकर गौ भी अर्पण करे। इस प्रकार विधि-विधान पूर्ण करनेपर मनुष्यको स्त्री, घर, पुत्र, राज्य और धन आदि जो-जो उसे अभीष्ट होता है, वह सब मनोवांछित फल प्राप्त होता है। परन्तु सकामभाव बहुत बड़ी विडम्बना है, वह श्रीमद्भागवतकी कथामें शोभा नहीं देता॥ ४६-४७॥