॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.1.3
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥ ३
nigamakalpatarorgalitaṃ phalaṃ śukamukhādamṛtadravasaṃyutam |
pibata bhāgavataṃ rasamālayaṃ muhuraho rasikā bhuvi bhāvukāḥ|| 3
अर्थ
रसके मर्मज्ञ भक्तजन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका पका हुआ फल है। श्रीशुकदेवरूप तोतेके* मुखका सम्बन्ध हो जानेसे यह परमानन्दमयी सुधासे परिपूर्ण हो गया है। इस फलमें छिलका, गुठली आदि त्याज्य अंश तनिक भी नहीं है। यह मूर्तिमान् रस है। जबतक शरीरमें चेतना रहे, तबतक इस दिव्य भगवद्रसका निरन्तर बार-बार पान करते रहो। यह पृथ्वीपर ही सुलभ है॥ ३॥
टिप्पणियाँ
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यह प्रसिद्ध है कि तोतेका काटा हुआ फल अधिक मीठा होता है।