श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.13

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सर्वे तेऽनिमिषैरक्षैस्तमनुद्रुतचेतसः।

वीक्षन्तः स्नेहसम्बद्धा विचेलुस्तत्र तत्र ह॥ १३

sarve te'nimiṣairakṣaistamanudrutacetasaḥ|

vīkṣantaḥ snehasambaddhā vicelustatra tatra ha|| 13

अर्थ

उनका चित्त द्रवित हो रहा था, वे सब निर्निमेष नेत्रोंसे भगवान्‌को देखते हुए स्नेहबन्धनसे बँधकर जहाँ-तहाँ दौड़ रहे थे॥ १३॥✎ 75 76

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #75 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखते → को देखते
  • #76 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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