॥ श्रीहरिः ॥
प्रासादशिखरारूढाः कुरुनार्यो दिदृक्षया।
ववृषुः कुसुमैः कृष्णं प्रेमव्रीडास्मितेक्षणाः॥ १६
prāsādaśikharārūḍhāḥ kurunāryo didṛkṣayā|
vavṛṣuḥ kusumaiḥ kṛṣṇaṃ premavrīḍāsmitekṣaṇāḥ|| 16
अर्थ
भगवान्के दर्शनकी लालसासे कुरुवंशकी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ गयीं और प्रेम, लज्जा एवं मुसकानसे युक्त चितवनसे भगवान्को देखती हुई उनपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं॥ १६॥✎ 77 78
प्रासादशिखरारूढाः कुरुनार्यो दिदृक्षया।
ववृषुः कुसुमैः कृष्णं प्रेमव्रीडास्मितेक्षणाः॥ १६
भगवान्के दर्शनकी लालसासे कुरुवंशकी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ गयीं और प्रेम, लज्जा एवं मुसकानसे युक्त चितवनसे भगवान्को देखती हुई उनपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.10.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 127) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/10/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #77 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखती → को देखती
- #78 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को