सुदृढ़ प्रेमके कारण कुरुवंशी पाण्डव भगवान्के साथ बहुत दूरतक चले गये। वे लोग उस समय भावी विरहसे व्याकुल हो रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें बहुत आग्रह करके विदा किया और सात्यकि, उद्धव आदि प्रेमी मित्रोंके साथ द्वारकाकी यात्रा की॥ ३३॥
अथ दूरागतान् शौरिः कौरवान् विरहातुरान्।
सन्निवर्त्य दृढं स्निग्धान् प्रायात्स्वनगरीं प्रियैः॥ ३३
सुदृढ़ प्रेमके कारण कुरुवंशी पाण्डव भगवान्के साथ बहुत दूरतक चले गये। वे लोग उस समय भावी विरहसे व्याकुल हो रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें बहुत आग्रह करके विदा किया और सात्यकि, उद्धव आदि प्रेमी मित्रोंके साथ द्वारकाकी यात्रा की॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.10.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 129) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/10/33/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—विदुरान्विताम्।
(मुद्रित पृष्ठ 129)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1900 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): संन्निवर्त्य → सन्निवर्त्य