श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

वारमुख्याश्‍च शतशो यानैस्तद्दर्शनोत्सुकाः।

लसत्कुण्डलनि५र्भातकपोलवदनश्रियः ॥ १९

vāramukhyāśca śataśo yānaistaddarśanotsukāḥ|

lasatkuṇḍalanirbhātakapolavadanaśriyaḥ || 19

अर्थ

साथ ही भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये उत्सुक सैकड़ों श्रेष्ठ वारांगनाएँ, जिनके मुख कपोलोंपर चमचमाते हुए कुण्डलोंकी कान्ति पड़नेसे बड़े सुन्दर दीखते थे, पालकियोंपर चढ़कर भगवान्‌की अगवानीके लिये चलीं॥ १९॥✎ 80 81

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—निर्भिन्‍न०।

    (मुद्रित पृष्ठ 132)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #80 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #81 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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