श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.23

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स्वयं च गुरुभिर्विप्रैः सदारैः स्थविरैरपि।

आशीर्भिर्युज्यमानोऽन्यैर्वन्दिभिश्चाविशत्पुरम्८॥ २३

svayaṃ ca gurubhirvipraiḥ sadāraiḥ sthavirairapi|

āśīrbhiryujyamāno'nyairvandibhiścāviśatpuram|| 23

अर्थ

किसीको सिर झुकाकर प्रणाम किया, किसीको वाणीसे अभिवादन किया, किसीको हृदयसे लगाया, किसीसे हाथ मिलाया, किसीकी ओर देखकर मुसकरा भर दिया और किसीको केवल प्रेमभरी दृष्टिसे देख लिया। जिसकी जो इच्छा थी, उसे वही वरदान दिया। इस प्रकार चाण्डालपर्यन्त सबको संतुष्ट करके गुरुजन, सपत्नीक ब्राह्मण और वृद्धोंका तथा दूसरे लोगोंका भी आशीर्वाद ग्रहण करते एवं वंदीजनोंसे विरुदावली सुनते हुए सबके साथ भगवान् श्रीकृष्णने नगरमें प्रवेश किया॥ २२-२३॥

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ८

    प्रा० पा०—पुरीम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 132)

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