भगवान्का वक्षःस्थल मूर्तिमान् सौन्दर्यलक्ष्मीका निवासस्थान है। उनका मुखारविन्द नेत्रोंके द्वारा पान करनेके लिये सौन्दर्य-सुधासे भरा हुआ पात्र है। उनकी भुजाएँ लोकपालोंको भी शक्ति देनेवाली हैं। उनके चरणकमल भक्त परमहंसोंके आश्रय हैं। उनके अंग-अंग शोभाके धाम हैं। भगवान्की इस छविको द्वारकावासी नित्य-निरन्तर निहारते रहते हैं, फिर भी उनकी आँखें एक क्षणके लिये भी तृप्त नहीं होतीं॥ २५-२६॥✎ 82
यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
श्रियो निवासो यस्योरः पानपात्रं मुखं दृशाम्।
बाहवो लोकपालानां सारङ्गाणां पदाम्बुजम्॥ २६
भगवान्का वक्षःस्थल मूर्तिमान् सौन्दर्यलक्ष्मीका निवासस्थान है। उनका मुखारविन्द नेत्रोंके द्वारा पान करनेके लिये सौन्दर्य-सुधासे भरा हुआ पात्र है। उनकी भुजाएँ लोकपालोंको भी शक्ति देनेवाली हैं। उनके चरणकमल भक्त परमहंसोंके आश्रय हैं। उनके अंग-अंग शोभाके धाम हैं। भगवान्की इस छविको द्वारकावासी नित्य-निरन्तर निहारते रहते हैं, फिर भी उनकी आँखें एक क्षणके लिये भी तृप्त नहीं होतीं॥ २५-२६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.11.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 133) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/11/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)