श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.5

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

प्रीत्युत्फुल्लमुखाः प्रोचुर्हर्षगद्गदया गिरा।

पितरं सर्वसुहृदमवितारमिवार्भकाः॥ ५

prītyutphullamukhāḥ procurharṣagadgadayā girā|

pitaraṃ sarvasuhṛdamavitāramivārbhakāḥ|| 5

अर्थ

सबके मुखकमल प्रेमसे खिल उठे। वे हर्षगद्गद वाणीसे सबके सुहृद‍् और संरक्षक भगवान् श्रीकृष्णकी ठीक वैसे ही स्तुति करने लगे, जैसे बालक अपने पितासे अपनी तोतली बोलीमें बातें करते हैं॥ ५॥

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