श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.12.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तदभिप्रेतमालक्ष्य भ्रातरोऽच्युतचोदिताः।

धनं प्रहीणमाजह्रुरुदीच्यां दिशि भूरिशः॥ ३३

tadabhipretamālakṣya bhrātaro'cyutacoditāḥ|

dhanaṃ prahīṇamājahrurudīcyāṃ diśi bhūriśaḥ|| 33

अर्थ

उनका अभिप्राय समझकर भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे उनके भाई उत्तर दिशामें राजा मरुत्त और ब्राह्मणोंद्वारा छोड़ा हुआ* बहुत-सा धन ले आये॥ ३३॥✎ 87 88

टिप्पणियाँ

  1. *

    पूर्वकालमें महाराज मरुत्तने ऐसा यज्ञ किया था, जिसमें सभी पात्र सुवर्णके थे। यज्ञ समाप्त हो जानेपर उन्होंने वे पात्र उत्तर दिशामें फिंकवा दिये थे। उन्होंने ब्राह्मणोंको भी इतना धन दिया कि वे उसे ले जा न सके; वे भी उसे उत्तर दिशामें ही छोड़कर चले आये। परित्यक्त धनपर राजाका अधिकार होता है, इसलिये उस धनको मँगवाकर भगवान्‌ने युधिष्ठिरका यज्ञ कराया।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 138)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #87 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #88 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें