चाहे अपनी समझसे हो या दूसरेके समझानेसे—जो इस संसारको दुःखरूप समझकर इससे विरक्त हो जाता है और अपने अन्तःकरणको वशमें करके हृदयमें भगवान्को धारणकर संन्यासके लिये घरसे निकल पड़ता है, वही उत्तम मनुष्य है॥ २६॥✎ 8990
यः स्वकात्परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्।
हृदि कृत्वा हरिं गेहात्प्रव्रजेत्स नरोत्तमः॥ २६
चाहे अपनी समझसे हो या दूसरेके समझानेसे—जो इस संसारको दुःखरूप समझकर इससे विरक्त हो जाता है और अपने अन्तःकरणको वशमें करके हृदयमें भगवान्को धारणकर संन्यासके लिये घरसे निकल पड़ता है, वही उत्तम मनुष्य है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 142) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/13/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)