श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.26

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यः स्वकात्परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्।

हृदि कृत्वा हरिं गेहात्प्रव्रजेत्स नरोत्तमः॥ २६

yaḥ svakātparato veha jātanirveda ātmavān|

hṛdi kṛtvā hariṃ gehātpravrajetsa narottamaḥ|| 26

अर्थ

चाहे अपनी समझसे हो या दूसरेके समझानेसे—जो इस संसारको दुःखरूप समझकर इससे विरक्त हो जाता है और अपने अन्तःकरणको वशमें करके हृदयमें भगवान्‌को धारणकर संन्यासके लिये घरसे निकल पड़ता है, वही उत्तम मनुष्य है॥ २६॥✎ 89 90

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #89 शब्दोंके बीचका स्थान: कोधारणकर → को धारणकर
  • #90 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें