श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्‍नः सुहृदः शिशून्।

अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्‍व गतावितः॥ ३३

pitaryuparate pāṇḍau sarvānnaḥ suhṛdaḥ śiśūn|

arakṣatāṃ vyasanataḥ pitṛvyau kva gatāvitaḥ|| 33

अर्थ

जब हमारे पिता पाण्डुकी मृत्यु हो गयी थी और हमलोग नन्हे-नन्हे बच्चे थे, तब इन्हीं दोनों चाचाओंने बड़े-बड़े दुःखोंसे हमें बचाया था। वे हमपर बड़ा ही प्रेम रखते थे। हाय! वे यहाँसे कहाँ चले गये?’॥ ३३॥

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