श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

विमृज्याश्रूणि पाणिभ्यां विष्टभ्यात्मानमात्मना।

अजातशत्रुं प्रत्यूचे प्रभोः पादावनुस्मरन्॥ ३५

vimṛjyāśrūṇi pāṇibhyāṃ viṣṭabhyātmānamātmanā|

ajātaśatruṃ pratyūce prabhoḥ pādāvanusmaran|| 35

अर्थ

फिर धीरे-धीरे बुद्धिके द्वारा उन्होंने अपने चित्तको स्थिर किया, हाथोंसे आँखोंके आसूँ पोंछे और अपने स्वामी धृतराष्ट्रके चरणोंका स्मरण करते हुए युधिष्ठिरसे कहा॥ ३५॥

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