श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.53

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

जितासनो जितश्वासः प्रत्याहृतषडिन्द्रियः।

हरिभावनया ध्वस्तरजःसत्त्वतमोमलः॥ ५३

jitāsano jitaśvāsaḥ pratyāhṛtaṣaḍindriyaḥ|

haribhāvanayā dhvastarajaḥsattvatamomalaḥ|| 53

अर्थ

आसन जीतकर प्राणोंको वशमें करके उन्होंने अपनी छहों इन्द्रियोंको विषयोंसे लौटा लिया है। भगवान्‌की धारणासे उनके तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके मल नष्ट हो चुके हैं॥ ५३॥✎ 92

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #92 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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