श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.59

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

इत्युक्‍त्वाथारुहत्१ स्वर्गं नारदः सहतुम्बुरुः।

युधिष्ठिरो वचस्तस्य हृदि कृत्वाजहाच्छुचः॥ ५९

ityuktvāthāruhat svargaṃ nāradaḥ sahatumburuḥ|

yudhiṣṭhiro vacastasya hṛdi kṛtvājahācchucaḥ|| 59

अर्थ

देवर्षि नारद यों कहकर तुम्बुरुके साथ स्वर्गको चले गये। धर्मराज युधिष्ठिरने उनके उपदेशोंको हृदयमें धारण करके शोकको त्याग दिया॥ ५९॥✎ 92

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
नैमिषीयोपाख्याने त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—इत्युक्‍त्वा चारुहत्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 145)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #92 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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