श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.8

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

युधिष्ठिर उवाच

अपि स्मरथ नो युष्मत्पक्षच्छायासमेधितान्।

विपद्गणाद्विषाग्न्यादेर्मोचिता यत्समातृकाः॥ ८

api smaratha no yuṣmatpakṣacchāyāsamedhitān|

vipadgaṇādviṣāgnyādermocitā yatsamātṛkāḥ|| 8

अर्थ

युधिष्ठिरने कहा—चाचाजी! जैसे पक्षी अपने अंडोंको पंखोंकी छायाके नीचे रखकर उन्हें सेते और बढ़ाते हैं, वैसे ही आपने अत्यन्त वात्सल्यसे अपने करकमलोंकी छत्रछायामें हमलोगोंको पाला-पोसा है। बार-बार आपने हमें और हमारी माताको विषदान और लाक्षागृहके दाह आदि विपत्तियोंसे बचाया है। क्या आप कभी हम लोगोंकी भी याद करते रहे हैं?॥ ८॥

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