श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

ऊर्वक्षिबाहवो मह्यं स्फुरन्त्यङ्ग पुनः पुनः।

वेपथुश्चापि हृदये आराद्दास्यन्ति विप्रियम्॥ ११

ūrvakṣibāhavo mahyaṃ sphurantyaṅga punaḥ punaḥ|

vepathuścāpi hṛdaye ārāddāsyanti vipriyam|| 11

अर्थ

प्यारे भीमसेन! मेरी बायीं जाँघ, आँख और भुजा बार-बार फड़क रही हैं। हृदय जोरसे धड़क रहा है। अवश्य ही बहुत जल्दी कोई अनिष्ट होनेवाला है॥ ११॥✎ 93

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #93 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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