श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.24

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

विलोक्योद्विग्नहृदयो विच्छायमनुजं नृपः।

पृच्छति स्म सुहृन्मध्ये संस्मरन्‍नारदेरितम्॥ २४

vilokyodvignahṛdayo vicchāyamanujaṃ nṛpaḥ|

pṛcchati sma suhṛnmadhye saṃsmarannāraderitam|| 24

अर्थ

युधिष्ठिरने देखा, अर्जुन इतने आतुर हो रहे हैं जितने पहले कभी नहीं देखे गये थे। मुँह लटका हुआ है, कमल-सरीखे नेत्रोंसे आँसू बह रहे हैं और शरीरमें बिलकुल कान्ति नहीं है। उनको इस रूपमें अपने चरणोंमें पड़ा देखकर युधिष्ठिर घबरा गये। देवर्षि नारदकी बातें याद करके उन्होंने सुहृदोंके सामने ही अर्जुनसे पूछा॥ २३-२४॥

यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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