श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.13

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तत्रैव मे विहरतो भुजदण्डयुग्मं

गाण्डीवलक्षणमरातिवधाय देवाः।

सेन्द्राः श्रिता यदनुभावितमाजमीढ

तेनाहमद्य मुषितः पुरुषेण भूम्ना॥ १३

tatraiva me viharato bhujadaṇḍayugmaṃ

gāṇḍīvalakṣaṇamarātivadhāya devāḥ|

sendrāḥ śritā yadanubhāvitamājamīḍha

tenāhamadya muṣitaḥ puruṣeṇa bhūmnā|| 13

अर्थ

उनके आग्रहसे जब मैं स्वर्गमें ही कुछ दिनोंतक रह गया, तब इन्द्रके साथ समस्त देवताओंने मेरी इन्हीं गाण्डीव धारण करनेवाली भुजाओंका निवातकवच आदि दैत्योंको मारनेके लिये आश्रय लिया। महाराज! यह सब जिनकी महती कृपाका फल था, उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने मुझे आज ठग लिया?॥ १३॥

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