श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

विशोको ब्रह्मसम्पत्त्या संछिन्‍नद्वैतसंशयः।

लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३१

viśoko brahmasampattyā saṃchinnadvaitasaṃśayaḥ|

līnaprakṛtinairguṇyādaliṅgatvādasambhavaḥ || 31

अर्थ

ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिसे मायाका आवरण भंग होकर गुणातीत अवस्था प्राप्त हो गयी। द्वैतका संशय निवृत्त हो गया। सूक्ष्मशरीर भंग हुआ। वे शोक एवं जन्म-मृत्युके चक्रसे सर्वथा मुक्त हो गये॥ ३१॥

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