श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.4

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

सख्यं मैत्रीं सौहृदं च सारथ्यादिषु संस्मरन्।

नृपमग्रजमित्याह बाष्पगद्गदया गिरा॥ ४

sakhyaṃ maitrīṃ sauhṛdaṃ ca sārathyādiṣu saṃsmaran|

nṛpamagrajamityāha bāṣpagadgadayā girā|| 4

अर्थ

श्रीकृष्णकी आँखोंसे ओझल हो जानेके कारण वे बढ़ी हुई प्रेमजनित उत्कण्ठाके परवश हो रहे थे। रथ हाँकने, टहलने आदिके समय भगवान्‌ने उनके साथ जो मित्रता, अभिन्‍नहृदयता और प्रेमसे भरे हुए व्यवहार किये थे, उनकी याद-पर-याद आ रही थी; बड़े कष्टसे उन्होंने अपने शोकका वेग रोका, हाथसे नेत्रोंके आँसू पोंछे और फिर रुँधे हुए गलेसे अपने बड़े भाई महाराज युधिष्ठिरसे कहा॥ ३—४॥✎ 94

यह अर्थ श्लोक 3–4 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #94 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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