yastvaṃ śaṃsasi kṛṣṇasya martyānāmamṛtaṃ hi naḥ|| 11
अर्थ
ऋषियोंने कहा—सौम्यस्वभाव सूतजी! आप युग-युग जीयें; क्योंकि मृत्युके प्रवाहमें पड़े हुए हम-लोगोंको आप भगवान् श्रीकृष्णकी अमृतमयी उज्ज्वल कीर्तिका श्रवण कराते हैं॥ ११॥✎ 110111
सूत जीव समाः सौम्य शाश्वतीर्विशदं यशः।
यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि नः॥ ११
ऋषियोंने कहा—सौम्यस्वभाव सूतजी! आप युग-युग जीयें; क्योंकि मृत्युके प्रवाहमें पड़े हुए हम-लोगोंको आप भगवान् श्रीकृष्णकी अमृतमयी उज्ज्वल कीर्तिका श्रवण कराते हैं॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 169) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)