श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.13

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।

भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥ १३

tulayāma lavenāpi na svargaṃ nāpunarbhavam|

bhagavatsaṅgisaṅgasya martyānāṃ kimutāśiṣaḥ|| 13

अर्थ

भगवत्-प्रेमी भक्तोंके लवमात्रके सत्संगसे स्वर्ग एवं मोक्षकी भी तुलना नहीं की जा सकती; फिर मनुष्योंके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या है॥ १३॥✎ 110 111

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #110 शब्दोंके बीचका स्थान: कोही → को ही
  • #111 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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