महामुनि शमीकको पुत्रके अपराधपर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। राजा परीक्षित्ने जो उनका अपमान किया था, उसपर तो उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया॥ ४९॥
इति पुत्रकृताघेन सोऽनुतप्तो महामुनिः।
स्वयं विप्रकृतो राज्ञा नैवाघं तदचिन्तयत्॥ ४९
महामुनि शमीकको पुत्रके अपराधपर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। राजा परीक्षित्ने जो उनका अपमान किया था, उसपर तो उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 174) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/18/49/