श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अन्ये च देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या

राजर्षिवर्या अरुणादयश्‍च।

नानार्षेयप्रवरान् समेता-

नभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे॥ ११

anye ca devarṣibrahmarṣivaryā

rājarṣivaryā aruṇādayaśca|

nānārṣeyapravarān sametā-

nabhyarcya rājā śirasā vavande|| 11

अर्थ

उस समय वहाँपर अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान्, अरिष्टनेमि, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाह, मेधातिथि, देवल, आर्ष्टिषेण, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, अगस्त्य, भगवान् व्यास, नारद तथा इनके अतिरिक्त और भी कई श्रेष्ठ देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा अरुणादि राजर्षिवर्योंका शुभागमन हुआ। इस प्रकार विभिन्‍न गोत्रोंके मुख्य-मुख्य ऋषियोंको एकत्र देखकर राजाने सबका यथायोग्य सत्कार किया और उनके चरणोंपर सिर रखकर वन्दना की॥ ९—११॥

यह अर्थ श्लोक 9–11 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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