श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.24

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

ततश्‍च वः पृच्छ्यमिमं विपृच्छे

विश्रभ्य विप्रा इतिकृत्यतायाम्।

सर्वात्मना म्रियमाणैश्‍च कृत्यं

शुद्धं च तत्रामृशताभियुक्ताः॥ २४

tataśca vaḥ pṛcchyamimaṃ vipṛcche

viśrabhya viprā itikṛtyatāyām|

sarvātmanā mriyamāṇaiśca kṛtyaṃ

śuddhaṃ ca tatrāmṛśatābhiyuktāḥ|| 24

अर्थ

विप्रवरो! आपलोगोंपर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने कर्तव्यके सम्बन्धमें यह पूछने योग्य प्रश्न करता हूँ। आप सभी विद्वान् परस्पर विचार करके बतलाइये कि सबके लिये सब अवस्थाओंमें और विशेष करके थोड़े ही समयमें मरनेवाले पुरुषोंके लिये अन्तःकरण और शरीरसे करनेयोग्य विशुद्ध कर्म कौन-सा है*॥ २४॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    इस जगह राजाने ब्राह्मणोंसे दो प्रश्न किये हैं; पहला प्रश्न यह है कि जीवको सदा-सर्वदा क्या करना चाहिये और दूसरा यह कि जो थोड़े ही समयमें मरनेवाले हैं, उनका क्या कर्तव्य है? ये ही दो प्रश्न उन्होंने श्रीशुकदेवजीसे भी किये तथा क्रमशः इन्हीं दोनों प्रश्नोंका उत्तर द्वितीय स्कन्धसे लेकर द्वादशपर्यन्त श्रीशुकदेवजीने दिया है।

    (मुद्रित पृष्ठ 178)

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