श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

निगूढजत्रुं पृथुतुङ्गवक्षस-

मावर्तनाभिं वलिवल्गूदरं च।

दिगम्बरं वक्‍त्रविकीर्णकेशं

प्रलम्बबाहुं स्वमरोत्तमाभम्॥ २७

nigūḍhajatruṃ pṛthutuṅgavakṣasa-

māvartanābhiṃ valivalgūdaraṃ ca|

digambaraṃ vaktravikīrṇakeśaṃ

pralambabāhuṃ svamarottamābham|| 27

अर्थ

हँसली ढकी हुई, छाती चौड़ी और उभरी हुई, नाभि भँवरके समान गहरी तथा उदर बड़ा ही सुन्दर, त्रिवलीसे युक्त था। लंबी-लंबी भुजाएँ थीं, मुखपर घुँघराले बाल बिखरे हुए थे। इस दिगम्बर वेषमें वे श्रेष्ठ देवताके समान तेजस्वी जान पड़ते थे॥ २७॥

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