श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.10

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।

जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः॥ १०

kāmasya nendriyaprītirlābho jīveta yāvatā|

jīvasya tattvajijñāsā nārtho yaśceha karmabhiḥ|| 10

अर्थ

भोगविलासका फल इन्द्रियोंको तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन है केवल जीवननिर्वाह। जीवनका फल भी तत्त्वजिज्ञासा है। बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है॥ १०॥✎ 25

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #25 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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