भगवान् श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी कथा सुननेवालोंके हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ वासनाओंको नष्ट कर देते हैं; क्योंकि वे संतोंके नित्य सुहृद् हैं॥ १७॥✎ 27
शृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥ १७
भगवान् श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी कथा सुननेवालोंके हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ वासनाओंको नष्ट कर देते हैं; क्योंकि वे संतोंके नित्य सुहृद् हैं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 86) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/2/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)