हृदयमें आत्मस्वरूप भगवान्का साक्षात्कार होते ही हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह मिट जाते हैं और कर्मबन्धन क्षीण हो जाता है॥ २१॥✎ 27
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे॥ २१
हृदयमें आत्मस्वरूप भगवान्का साक्षात्कार होते ही हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह मिट जाते हैं और कर्मबन्धन क्षीण हो जाता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 86) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/2/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)