श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.21

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्‍वरे॥ २१

bhidyate hṛdayagranthiśchidyante sarvasaṃśayāḥ|

kṣīyante cāsya karmāṇi dṛṣṭa evātmanīśvare|| 21

अर्थ

हृदयमें आत्मस्वरूप भगवान्‌का साक्षात्कार होते ही हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह मिट जाते हैं और कर्मबन्धन क्षीण हो जाता है॥ २१॥✎ 27

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #27 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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