श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव।

अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः॥ ३१

tayā vilasiteṣveṣu guṇeṣu guṇavāniva|

antaḥpraviṣṭa ābhāti vijñānena vijṛmbhitaḥ|| 31

अर्थ

ये सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण उसी मायाके विलास हैं; इनके भीतर रहकर भगवान् इनसे युक्त-सरीखे मालूम पड़ते हैं। वास्तवमें तो वे परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं॥ ३१॥

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