भावयत्येष सत्त्वेन लोकान् वै लोकभावनः।
लीलावतारानुरतो देवतिर्यङ्नरादिषु॥ ३४
वे ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुणके द्वारा जीवोंका पालन-पोषण करते हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 88) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/2/34/