श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.36

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स वा इदं विश्‍वममोघलीलः सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन्।

भूतेषु चान्तर्हित आत्मतन्त्रः षाड्वर्गिकं जिघ्रति षड्गुणेशः॥ ३६

sa vā idaṃ viśvamamoghalīlaḥ sṛjatyavatyatti na sajjate'smin|

bhūteṣu cāntarhita ātmatantraḥ ṣāḍvargikaṃ jighrati ṣaḍguṇeśaḥ|| 36

अर्थ

भगवान्‌की लीला अमोघ है। वे लीलासे ही इस संसारका सृजन, पालन और संहार करते हैं, किंतु इसमें आसक्त नहीं होते। प्राणियोंके अन्तःकरणमें छिपे रहकर ज्ञानेन्द्रिय और मनके नियन्ताके रूपमें उनके विषयोंको ग्रहण भी करते हैं, परंतु उनसे अलग रहते हैं, वे परम स्वतन्त्र हैं—ये विषय कभी उन्हें लिप्त नहीं कर सकते॥ ३६॥ जैसे अनजान मनुष्य जादूगर अथवा नटके संकल्प और वचनोंसे की हुई करामातको नहीं समझ पाता, वैसे ही अपने संकल्प और वेदवाणीके द्वारा भगवान्‌के प्रकट किये हुए इन नाना नाम और रूपोंको तथा उनकी लीलाओंको कुबुद्धि जीव बहुत-सी तर्क-युक्तियोंके द्वारा नहीं पहचान सकता॥ ३७॥ चक्रपाणि भगवान्‌की शक्ति और पराक्रम अनन्त है—उनकी कोई थाह नहीं पा सकता। वे सारे जगत‍्के निर्माता होनेपर भी उससे सर्वथा परे हैं। उनके स्वरूपको अथवा उनकी लीलाके रहस्यको वही जान सकता है, जो नित्य-निरन्तर निष्कपटभावसे उनके चरणकमलोंकी दिव्य गन्धका सेवन करता है—सेवाभावसे उनके चरणोंका चिन्तन करता रहता है॥ ३८॥ ✎ 33 34

यह व्याख्या श्लोक 1.3.36 से 1.3.38 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #33 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #34 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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