॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.4.5
दृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजम१प्यनग्नं
देव्यो ह्रिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम्।
तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्ति
स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टेः॥ ५
dṛṣṭvānuyāntamṛṣimātmajamapyanagnaṃ
devyo hriyā paridadhurna sutasya citram|
tadvīkṣya pṛcchati munau jagadustavāsti
strīpumbhidā na tu sutasya viviktadṛṣṭeḥ|| 5
अर्थ
व्यासजी जब संन्यासके लिये वनकी ओर जाते हुए अपने पुत्रका पीछा कर रहे थे, उस समय जलमें स्नान करनेवाली स्त्रियोंने नंगे शुकदेवको देखकर तो वस्त्र धारण नहीं किया, परंतु वस्त्र पहने हुए व्यासजीको देखकर लज्जासे कपड़े पहन लिये थे। इस आश्चर्यको देखकर जब व्यासजीने उन स्त्रियोंसे इसका कारण पूछा, तब उन्होंने उत्तर दिया कि ‘आपकी दृष्टिमें तो अभी स्त्री-पुरुषका भेद बना हुआ है, परंतु आपके पुत्रकी शुद्ध दृष्टिमें यह भेद नहीं है’॥ ५॥✎ 1278 1279
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मप्सु मग्नाः।