महाभाग व्यासजी! आपकी दृष्टि अमोघ है। आपकी कीर्ति पवित्र है। आप सत्यपरायण एवं दृढ़व्रत हैं। इसलिये अब आप सम्पूर्ण जीवोंको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये समाधिके द्वारा अचिन्त्यशक्ति भगवान्की लीलाओंका स्मरण कीजिये॥ १३॥✎ 4041424344454615711572
अथो महाभाग भवानमोघदृक्
शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः।
उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये
समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम्॥ १३
महाभाग व्यासजी! आपकी दृष्टि अमोघ है। आपकी कीर्ति पवित्र है। आप सत्यपरायण एवं दृढ़व्रत हैं। इसलिये अब आप सम्पूर्ण जीवोंको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये समाधिके द्वारा अचिन्त्यशक्ति भगवान्की लीलाओंका स्मरण कीजिये॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.5.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 98) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/5/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)