श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामुने

प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम।

ययाहमेतत्सदसत्स्वमायया

पश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे॥ २७

tasmiṃstadā labdharucermahāmune

priyaśravasyaskhalitā matirmama|

yayāhametatsadasatsvamāyayā

paśye mayi brahmaṇi kalpitaṃ pare|| 27

अर्थ

महामुने! जब भगवान्‌में मेरी रुचि हो गयी, तब उन मनोहरकीर्ति प्रभुमें मेरी बुद्धि भी निश्‍चल हो गयी। उस बुद्धिसे मैं इस सम्पूर्ण सत् और असत्-रूप जगत‍्को अपने परब्रह्मस्वरूप आत्मामें मायासे कल्पित देखने लगा॥ २७॥✎ 48 49

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #48 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #49 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें