इस लोकमें जो शास्त्रविहित कर्म भगवान्की प्रसन्नताके लिये किये जाते हैं, उन्हींसे पराभक्तियुक्त ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ ३५॥✎ 505152
यदत्र क्रियते कर्म भगवत्परितोषणम्।
ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम्॥ ३५
इस लोकमें जो शास्त्रविहित कर्म भगवान्की प्रसन्नताके लिये किये जाते हैं, उन्हींसे पराभक्तियुक्त ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.5.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 101) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/5/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)