श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यदत्र क्रियते कर्म भगवत्परितोषणम्।

ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम्॥ ३५

yadatra kriyate karma bhagavatparitoṣaṇam|

jñānaṃ yattadadhīnaṃ hi bhaktiyogasamanvitam|| 35

अर्थ

इस लोकमें जो शास्त्रविहित कर्म भगवान्‌की प्रसन्‍नताके लिये किये जाते हैं, उन्हींसे पराभक्तियुक्त ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ ३५॥✎ 50 51 52

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #50 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #51 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसमर्पित → को समर्पित
  • #52 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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