श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.4

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

जिज्ञासितमधीतं च यत्तद्ब्रह्म सनातनम्।

अ२थापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो॥ ४

jijñāsitamadhītaṃ ca yattadbrahma sanātanam|

athāpi śocasyātmānamakṛtārtha iva prabho|| 4

अर्थ

सनातन ब्रह्मतत्त्वको भी आपने खूब विचारा है और जान भी लिया है। फिर भी प्रभु! आप अकृतार्थ पुरुषके समान अपने विषयमें शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—तथापि।

    (मुद्रित पृष्ठ 97)

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