भगवान्का वह अनिर्वचनीय रूप समस्त शोकोंका नाश करनेवाला और मनके लिये अत्यन्त लुभावना था। सहसा उसे न देख मैं बहुत ही विकल हो गया और अनमना-सा होकर आसनसे उठ खड़ा हुआ॥ १९॥
रूपं भगवतो यत्तन्मनःकान्तं शुचापहम्।
अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद्दुर्मना इव॥ १९
भगवान्का वह अनिर्वचनीय रूप समस्त शोकोंका नाश करनेवाला और मनके लिये अत्यन्त लुभावना था। सहसा उसे न देख मैं बहुत ही विकल हो गया और अनमना-सा होकर आसनसे उठ खड़ा हुआ॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 104) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/6/19/