श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

स्वप्राणान् यः परप्राणैः प्रपुष्णात्यघृणः खलः।

तद्वधस्तस्य हि श्रेयो यद्दोषाद्यात्यधः पुमान्॥ ३७

svaprāṇān yaḥ paraprāṇaiḥ prapuṣṇātyaghṛṇaḥ khalaḥ|

tadvadhastasya hi śreyo yaddoṣādyātyadhaḥ pumān|| 37

अर्थ

परन्तु जो दुष्ट और क्रूर पुरुष दूसरोंको मारकर अपने प्राणोंका पोषण करता है, उसका तो वध ही उसके लिये कल्याणकारी है; क्योंकि वैसी आदतको लेकर यदि वह जीता है तो और भी पाप करता है और उन पापोंके कारण नरकगामी होता है॥ ३७॥✎ 66 67 68

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #66 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #67 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #68 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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