tadvadhastasya hi śreyo yaddoṣādyātyadhaḥ pumān|| 37
अर्थ
परन्तु जो दुष्ट और क्रूर पुरुष दूसरोंको मारकर अपने प्राणोंका पोषण करता है, उसका तो वध ही उसके लिये कल्याणकारी है; क्योंकि वैसी आदतको लेकर यदि वह जीता है तो और भी पाप करता है और उन पापोंके कारण नरकगामी होता है॥ ३७॥✎ 666768
स्वप्राणान् यः परप्राणैः प्रपुष्णात्यघृणः खलः।
तद्वधस्तस्य हि श्रेयो यद्दोषाद्यात्यधः पुमान्॥ ३७
परन्तु जो दुष्ट और क्रूर पुरुष दूसरोंको मारकर अपने प्राणोंका पोषण करता है, उसका तो वध ही उसके लिये कल्याणकारी है; क्योंकि वैसी आदतको लेकर यदि वह जीता है तो और भी पाप करता है और उन पापोंके कारण नरकगामी होता है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 110) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/7/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)