महाभाग्यवान् आर्यपुत्र! आप तो बड़े धर्मज्ञ हैं। जिस गुरुवंशकी नित्य पूजा और वन्दना करनी चाहिये उसीको व्यथा पहुँचाना आपके योग्य कार्य नहीं है॥ ४६॥
तद् धर्मज्ञ महाभाग भवद्भिर्गौरवं कुलम्।
वृजिनं नार्हति प्राप्तुं पूज्यं वन्द्यमभीक्ष्णशः॥ ४६
महाभाग्यवान् आर्यपुत्र! आप तो बड़े धर्मज्ञ हैं। जिस गुरुवंशकी नित्य पूजा और वन्दना करनी चाहिये उसीको व्यथा पहुँचाना आपके योग्य कार्य नहीं है॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 111) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/7/46/