श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.57

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वपनं द्रविणादानं स्थानान्‍निर्यापणं तथा।

एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः॥ ५७

vapanaṃ draviṇādānaṃ sthānānniryāpaṇaṃ tathā|

eṣa hi brahmabandhūnāṃ vadho nānyo'sti daihikaḥ|| 57

अर्थ

मूँड देना, धन छीन लेना और स्थानसे बाहर निकाल देना—यही ब्राह्मणाधमोंका वध है। उनके लिये इससे भिन्‍न शारीरिक वधका विधान नहीं है॥ ५७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें