eṣa hi brahmabandhūnāṃ vadho nānyo'sti daihikaḥ|| 57
अर्थ
मूँड देना, धन छीन लेना और स्थानसे बाहर निकाल देना—यही ब्राह्मणाधमोंका वध है। उनके लिये इससे भिन्न शारीरिक वधका विधान नहीं है॥ ५७॥
वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा।
एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः॥ ५७
मूँड देना, धन छीन लेना और स्थानसे बाहर निकाल देना—यही ब्राह्मणाधमोंका वध है। उनके लिये इससे भिन्न शारीरिक वधका विधान नहीं है॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 112) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/57/