श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये।

आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः॥ २७

namo'kiñcanavittāya nivṛttaguṇavṛttaye|

ātmārāmāya śāntāya kaivalyapataye namaḥ|| 27

अर्थ

आप निर्धनोंके परम धन हैं। मायाका प्रपंच आपका स्पर्श भी नहीं कर सकता। आप अपने-आपमें ही विहार करनेवाले, परम शान्तस्वरूप हैं। आप ही कैवल्य मोक्षके अधिपति हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूँ॥ २७॥

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