श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.43

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिध्रुग्-

राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य ।

गोविन्द गोद्विजसुरार्तिहरावतार

योगेश्‍वराखिलगुरो भगवन्‍नमस्ते॥ ४३

śrīkṛṣṇa kṛṣṇasakha vṛṣṇyṛṣabhāvanidhrug-

rājanyavaṃśadahanānapavargavīrya |

govinda godvijasurārtiharāvatāra

yogeśvarākhilaguro bhagavannamaste|| 43

अर्थ

श्रीकृष्ण! अर्जुनके प्यारे सखा यदुवंशशिरोमणे! आप पृथ्वीके भाररूप राजवेशधारी दैत्योंको जलानेके लिये अग्‍निस्वरूप हैं। आपकी शक्ति अनन्त है। गोविन्द! आपका यह अवतार गौ, ब्राह्मण और देवताओंका दुःख मिटानेके लिये ही है। योगेश्‍वर! चराचरके गुरु भगवन्! मैं आपको नमस्कार करती हूँ॥ ४३॥✎ 1574

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1574 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अग्‍नि-स्वरूप → अग्‍निस्वरूप

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें