श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.46

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

व्यासाद्यैरीश्‍वरेहाज्ञैः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।

प्रबोधितोऽपीतिहासैर्नाबुध्यत शुचार्पितः२॥ ४६

vyāsādyairīśvarehājñaiḥ kṛṣṇenādbhutakarmaṇā|

prabodhito'pītihāsairnābudhyata śucārpitaḥ|| 46

अर्थ

राजा युधिष्ठिरको अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेका बड़ा शोक हो रहा था। भगवान्‌की लीलाका मर्म जाननेवाले व्यास आदि महर्षियोंने और स्वयं अद्भुत चरित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने भी अनेकों इतिहास कहकर उन्हें समझानेकी बहुत चेष्टा की; परंतु उन्हें सान्त्वना न मिली, उनका शोक न मिटा॥ ४६॥✎ 70 71

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—शुचार्दिताः।

    (मुद्रित पृष्ठ 118)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #70 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #71 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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